शक्ति और मनोकामना की देवी मां छिन्नमस्तिका का रजरप्पा स्थित मंदिर नवरात्रि के दौरान भक्तों का ताता लगा रहता है. भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल यह मंदिर कामाख्या मंदिर के बाद दूसरा स्थान रखता है. नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं. नवरात्र के दौरान मां के नौ रूपों की अलग-अलग दिन पूजा करते हैं. मां को विशेष भोग अर्पित किया जाता है.
मां छिन्नमस्तिका का स्वरूप
मां छिन्नमस्तिका की प्रतिमा अपने आप में रहस्य और शक्ति का अद्भुत प्रतीक है. दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना कटा हुआ सिर, गले से बहती तीन रक्तधाराएं, तीन नेत्रों वाली मां, कमल पुष्प पर खड़ी और साथ में डाकिनी और शाकिनी, जिन्हें मां अपनी रक्तधारा से तृप्त कर रही हैं.
पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार मां भवानी अपनी दो सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं. स्नान के बाद सहेलियों को भूख लगी और वे बेहाल होने लगीं. मां ने बिना विलंब किए खड्ग से अपना सिर काट लिया. उनके गले से निकली रक्तधारा को सहेलियों की ओर बहा दिया और शेष को स्वयं पान किया. तभी से मां का यह रूप छिन्नमस्तिका के नाम से जाना जाने लगा.
नवरात्रि की धूम और सजावट
नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर को विशेष रूप से सजाया गया है. कोलकाता, ऑस्ट्रेलिया और थाईलैंड से मंगाए गए फूलों से मंदिर की भव्य सजावट की गई है. मंदिर की दिव्यता और सौंदर्य भक्तों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. हर साल की तरह इस बार भी मां के भक्त 9 दिन तक कठोर साधना और व्रत के साथ देवी आराधना में लीन हैं. मान्यता है कि मां छिन्नमस्तिका के दर्शन और भक्ति से सभी कष्टों का नाश होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.